चर्चा में क्यों?
हाल ही में अगस्त 2026 में जापान के रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा, जुलाई 2026 में संपन्न 8वीं भारत-जापान रक्षा नीति वार्ता (Defence Policy Dialogue) और आगामी चौथी ‘2+2’ विदेश और रक्षा मंत्रिस्तरीय बैठक की तैयारियों ने दोनों देशों के रक्षा संबंधों को एक नई गति दी है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, दोनों देशों के बीच हुआ समुद्री सुरक्षा सहयोग समझौता (MoA) और यूनिकॉर्न प्रोजेक्ट (UNICORN System) का क्रियान्वयन इस बात का प्रमाण है कि यह साझेदारी केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर व्यावहारिक और परिचालन क्षमता (Operational Capability) में तब्दील हो रही है।

पृष्ठभूमि: भारत जापान संबंधों का आधार
भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग केवल द्विपक्षीय हितों पर नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के साझा दृष्टिकोण पर टिका है। दोनों देश ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ (Special Strategic and Global Partnership) के तहत काम करते हैं। इस सहयोग के पीछे प्रमुख कारक हैं:
- ‘स्वतंत्र और खुला हिंद-प्रशांत’ (Free and Open Indo-Pacific – FOIP): नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
- चीन की आक्रामक नीति: पूर्वी चीन सागर, दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में चीन की विस्तारवादी गतिविधियों का मुकाबला करना।
- बहुपक्षीय मंच (जैसे QUAD): भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का साझा मंच जो क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए सह-आर्किटेक्ट की भूमिका निभा रहा है।
रक्षा सहयोग के उभरते ‘नए आयाम’ (Emerging New Dimensions)
विगत एक वर्ष (2025-2026) में भारत-जापान रक्षा सहयोग में कई क्रांतिकारी बदलाव देखे गए हैं, जिन्हें निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं में समझा जा सकता है:
परिचालनगत एकीकरण और सूचना साझाकरण (Operational Integration)
- समुद्री सुरक्षा समझौता: अगस्त 2026 में हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत सूचना साझाकरण (Information Sharing), जहाजों की मरम्मत और लॉजिस्टिक्स सहायता में अभूतपूर्व सहयोग की नींव रखी गई है।
- समुद्री डोमेन जागरूकता और सूचना साझा करना: जापान पूर्वी चीन सागर और ताइवान के आसपास केंद्रित है, जबकि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में केंद्रीय भूमिका निभाता है; एक करीबी सूचना-साझाकरण वास्तुकला से परिचालन परिचितता विकसित हो रही है।
- हिंद-प्रशांत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN): दोनों देशों ने आपदा राहत और सैन्य आपूर्ति को सुगम बनाने के लिए इस नेटवर्क के क्रियान्वयन पर जोर दिया है, जिसकी दूसरी टेबलटॉप एक्सरसाइज (Tabletop Exercise) सितंबर 2026 में जापान में निर्धारित है।
- डायरेक्टर-जनरल/संयुक्त सचिव स्तर पर नया वर्किंग ग्रुप: परिचालन (Operational), खुफिया (Intelligence), उपकरण और सैन्य-औद्योगिक क्षेत्रों में एकीकृत तरीके से काम करने के लिए इस नए कार्यसमूह का गठन किया गया है।
रक्षा उपकरण और प्रौद्योगिकी का सह-विकास (Co-Development)
- यूनिकॉर्न प्रोजेक्ट (UNICORN Antenna System): जापान ने भारत को अपने उन्नत एकीकृत संचार एंटीना सिस्टम (UNICORN) के हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज कर दी है। यह भारतीय नौसेना की स्टील्थ क्षमता को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगा।
- संयुक्त जहाज निर्माण और डिजाइन: दोनों देशों ने नौसैनिक जहाजों के सह-विकास और संयुक्त विनिर्माण पर सहमति जताई है, जिससे भारत की विनिर्माण क्षमता और जापान की उच्च तकनीक का मिलाजुला लाभ मिलेगा।
- मेक इन इंडिया और शिप रिपेयर: ‘मेक इन इंडिया’ फ्रेमवर्क के तहत जापानी उत्पादन क्षमताओं के उपयोग और जहाज मरम्मत सुविधाओं के लिए पारस्परिक व्यवस्था की दिशा में चर्चा गहरी हुई है।
- उभरती प्रौद्योगिकियां: रक्षा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में डीआरडीओ (DRDO) और जापान की एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स एजेंसी (ATLA) मिलकर काम कर रही हैं।
युद्धाभ्यासों की बढ़ती जटिलता (Complex Military Exercises)
- वीर गार्जियन (Veer Guardian 2026): सितंबर 2026 में पहली बार जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स के लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना के साथ भारत में अभ्यास कर रहे हैं। इसमें मानवरहित प्रणालियों (Unmanned Systems) का एकीकरण भी शामिल किया गया है।
- त्रिपक्षीय सहयोग (Trilateral Outreach): फरवरी 2026 में भारत, जापान और इंडोनेशिया के बीच पहली त्रिपक्षीय नौसैनिक पैसेक्स (PASSEX) का आयोजन हुआ, जो दर्शाता है कि दोनों देश तीसरे देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा का विस्तार कर रहे हैं।
- अन्य नियमित अभ्यास जैसे जिमेक्स (JIMEX – नौसेना), धर्मगार्जियन (Dharma Guardian – थलसेना), और बहुपक्षीय मालाबार (Malabar) अभ्यास निरंतर मजबूत हो रहे हैं।
प्रमुख चुनौतियाँ (Structural Bottlenecks)
1. नियामक और नौकरशाही बाधाएं: जापान का सख्त रक्षा निर्यात नियंत्रण कानून और भारत की जटिल रक्षा खरीद प्रक्रियाएं अक्सर रक्षा सौदों को व्यावहारिक रूप देने में देरी का कारण बनती हैं।
2. गठबंधन बनाम रणनीतिक स्वायत्तता: जापान एक औपचारिक अमेरिकी संधि सहयोगी है, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखना चाहता है।
3. आर्थिक संबंधों की तुलना में रक्षा की गति धीमी: यद्यपि जापान भारत में 10 ट्रिलियन येन के निवेश लक्ष्य के साथ आर्थिक सुरक्षा बढ़ा रहा है, सैन्य-औद्योगिक स्तर पर वास्तविक रक्षा उत्पादकता अभी भी शुरुआती चरण में है।
आगे की राह (Way Forward)
- वाणिज्यिक विनिर्माण में बदलाव: रक्षा सहयोग को केवल बातचीत और समझौतों से आगे बढ़ाकर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत वास्तविक हार्डवेयर उत्पादन में बदलना होगा।
- आकस्मिक युद्धाभ्यास (Short Notice Exercises): जैसे कि हाल ही में सहमति बनी है, पूर्व-निर्धारित अभ्यासों के बजाय ‘शॉर्ट नोटिस’ पर मॉक ड्रिल की जानी चाहिए ताकि वास्तविक संकट के समय तत्परता को परखा जा सके।
- थिएटर कमांड का समन्वय: भारत के आगामी एकीकृत थिएटर कमांड (Integrated Theatre Commands) के साथ जापान के आत्मरक्षा बलों (SDF) का समन्वय भविष्य के सुरक्षा ढांचे के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत-जापान रक्षा सहयोग अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रह गया है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत की सुरक्षा वास्तुकला का एक मुख्य स्तंभ बन चुका है। वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में, दोनों देशों का एक साथ आना एशिया में शक्ति संतुलन (Balance of Power) बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
