चर्चा में क्यों?
हाल ही में 6 सितंबर, 2026 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में ‘सेलिब्रेट वननेस’ (Celebrate Oneness) कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि “एक हिंदू के लिए ब्रिटिश नागरिक होने और हिंदू होने में कोई आंतरिक टकराव नहीं है।” उन्होंने वैश्विक पटल पर रह रहे भारतीयों से अपील की कि वे जिस देश में रह रहे हैं और आजीविका कमा रहे हैं (उनकी कर्मभूमि), वे उसके प्रति पूरी तरह वफादार रहें।

आरएसएस, जो पारंपरिक रूप से भारत की सीमाओं के भीतर ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘मिट्टी के प्रति अटूट निष्ठा’ की बात करता है, उसके द्वारा वैश्विक मंच पर वफादारी की यह नई व्याख्या भू-राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक हलकों में एक नए विमर्श को जन्म दे रही है। यह घटना इस बात का संकेत है कि वैश्वीकरण के इस दौर में राष्ट्रवाद की पारंपरिक परिभाषाएं अब सीमाओं को पार कर रही हैं।
राष्ट्रवाद के बदलते प्रतिमान: दो वैचारिक धाराएँ
इतिहासकार बेनेडिक्ट एंडरसन ने कभी राष्ट्र को एक “कल्पित समुदाय” (Imagined Community) कहा था। इस कल्पना को आकार देने के लिए मुख्य रूप से दो वैचारिक दृष्टिकोण काम करते हैं, जिनका उल्लेख इस विमर्श में प्रासंगिक है:
- क्षेत्रीय राष्ट्रवाद (Territorial Nationalism): यह वेस्टफेलियाई मॉडल पर आधारित है। इसके अनुसार, एक निश्चित भौगोलिक सीमा के भीतर रहने वाले सभी लोग—चाहे उनका धर्म, जाति या नस्ल कुछ भी हो—एक समान राष्ट्र का हिस्सा हैं। भारत में जवाहरलाल नेहरू की कालजयी पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ इसी क्षेत्रीय और बहुसांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती है।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (Cultural Nationalism): यह मॉडल भौगोलिक सीमाओं को नहीं, बल्कि साझा संस्कृति, इतिहास, सभ्यता और परंपराओं को राष्ट्र का मूल आधार मानता है। इसके अनुसार, एक संस्कृति को मानने वाले लोग दुनिया के किसी भी कोने में रहें, वे एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं। आरएसएस का ‘हिंदू राष्ट्र’ का विचार इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित है, जो वैश्विक स्तर पर बिखरे हिंदुओं को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करता है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण और ‘वफादारी’ का वैचारिक द्वंद्व
इस नए विमर्श को समझने के लिए हिंदुत्व के मार्गदर्शक विचारक वी.डी. सावरकर के विचारों को समझना आवश्यक है:
- सावरकर की परिभाषा: सावरकर ने अपनी मौलिक रचना ‘हिंदुत्व: हू इज अ हिंदू?’ में स्पष्ट किया था कि सच्चा हिंदू वह है जिसके लिए भारत ‘पितृभूमि’ (Fatherland) और ‘पुण्यभूमि’ (Sacred Land) दोनों है। ऐतिहासिक रूप से, इस परिभाषा का उपयोग भारत के भीतर उन धार्मिक अल्पसंख्यकों (जैसे मुस्लिम और ईसाई) की वफादारी पर सवाल उठाने के लिए किया जाता रहा है, जिनके पवित्र स्थल भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर हैं।
- भागवत का आधुनिक मोड़: लंदन के संबोधन में मोहन भागवत ने इस पारंपरिक समझ को एक नया व्यावहारिक विस्तार दिया। उन्होंने कहा:
“आपकी जन्मभूमि या मूल स्थान चाहे जो हो, आपकी पुण्यभूमि चाहे जो हो… लेकिन आपको अपनी ‘कर्मभूमि’ (जहां आप रह रहे हैं, कमा रहे हैं) के प्रति वफादार होना चाहिए और उसकी सेवा करनी चाहिए। हिंदुत्व कभी आपको अपनी कर्मभूमि से गद्दारी करना नहीं सिखाता।”
- वैचारिक विकास: यह बयान दिखाता है कि दक्षिणपंथी विमर्श अब यह स्वीकार कर रहा है कि आधुनिक विश्व में वफादारी का पैमाना केवल धार्मिक आस्था या पुण्यभूमि से तय नहीं होता, बल्कि निवास और नागरिकता के आधुनिक सिद्धांतों (Modern Concept of Citizenship) से तय होता है।
डिजिटल डायस्पोरा और ‘प्रवासी दुविधा’ (The Diaspora Dilemma)
वर्तमान में भारत से हर साल औसतन 1.5 लाख लोग अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ रहे हैं और विदेशों का रुख कर रहे हैं। इस ‘ट्रांसनेशनल’ (सीमाओं से परे) युग में राष्ट्रवाद कई अनूठे विरोधाभासों को जन्म दे रहा है:
- डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर (मनोवैज्ञानिक विभाजन): विदेशी नागरिकता और पासपोर्ट लेने के बाद भी प्रवासी भारतीय राजनीतिक और आर्थिक रूप से अपनी मूल मातृभूमि से गहराई से जुड़े रहते हैं। वे विदेशों में बैठकर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हैं और भारत की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करते हैं। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में यह स्थिति एक प्रकार के ‘पहचान के द्वंद्व’ को दर्शाती है, जहाँ व्यक्ति दो अलग-अलग व्यवस्थाओं के प्रति वफादारी संतुलित करने का प्रयास करता है।
- विवादों का निर्यात: एक बड़ी चिंता यह है कि उपमहाद्वीप के आंतरिक सामाजिक-धार्मिक और जातिगत विवाद भी अब प्रवासियों के साथ विदेशों (जैसे ऑस्ट्रेलिया, यूके, कनाडा और यूएस) में निर्यात हो रहे हैं, जिससे वहां के स्थानीय समाज में तनाव पैदा हो रहा है।
- श्वेत राष्ट्रवाद (White Nativism) का उभार: जब प्रवासी भारतीय अपनी मूल संस्कृति के प्रति अत्यधिक मुखर होते हैं, तो पश्चिमी देशों में बढ़ रहे ‘दक्षिणपंथी संरक्षणवाद’ और ‘नस्लवाद’ के कारण उनकी वफादारी पर सवाल उठाए जाते हैं। उनसे पूछा जाता है कि क्या एक विदेशी मूल का व्यक्ति वास्तव में उनके देश का वफादार नागरिक हो सकता है? मोहन भागवत का लंदन भाषण इसी वैश्विक डर को दूर करने का एक कूटनीतिक प्रयास था।
अंतर्निहित विरोधाभास और वैचारिक चुनौतियाँ
सीमाओं से परे राष्ट्रवाद की इस नई परिभाषा के सामने कुछ गंभीर सैद्धांतिक सवाल खड़े होते हैं:
- आंतरिक बनाम बाहरी मापदंड (The Litmus Test): यदि लंदन में रहने वाले एक ब्रिटिश-हिंदू की वफादारी उसकी ‘कर्मभूमि’ (यूके की नागरिकता) से तय होती है, तो तार्किक रूप से यही नियम भारत के भीतर रहने वाले मुस्लिमों और ईसाइयों पर भी लागू होना चाहिए। भारत के संदर्भ में भी वफादारी का पैमाना उनकी धार्मिक आस्था (पुण्यभूमि) के बजाय भारत के संविधान और नागरिकता के प्रति उनकी निष्ठा को माना जाना चाहिए।
- वैश्विक लोक-कल्याण बनाम कठोर सीमाएं: यदि आरएसएस का यह मानना है कि वैश्विक स्तर पर सभी मनुष्यों के पूर्वज एक हैं (वसुधैव कुटुंबकम), तो दूसरी तरफ भारत की सीमाओं पर अवैध प्रवासियों और घुसपैठियों के खिलाफ संगठन का सख्त रुख एक विरोधाभास पैदा करता है। यह दर्शाता है कि व्यावहारिक राजनीति में ‘सांस्कृतिक उदारता’ और ‘कठोर क्षेत्रीय संप्रभुता’ के बीच संतुलन बनाना कितना कठिन है।
आगे की राह:
- संवैधानिक देशभक्ति (Constitutional Patriotism) को बढ़ावा: भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में राष्ट्रवाद का आधार किसी विशिष्ट धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के बजाय ‘संवैधानिक मूल्यों’ को बनाया जाना चाहिए। भारत के भीतर और बाहर, नागरिकता और कानून का शासन ही वफादारी का एकमात्र पैमाना होना चाहिए।
- प्रबुद्ध प्रवासी नीति (Enlightened Diaspora Policy): भारत सरकार के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी नेटवर्क (लगभग 3.2 करोड़) है, जो देश के लिए ‘सॉफ्ट पावर’ और ‘रेमिटेंस’ का बड़ा स्रोत है। भारत को प्रवासियों के साथ ऐसा जुड़ाव रखना चाहिए जो उन्हें अपनी मूल संस्कृति से भी जोड़े रखे और उनके निवास वाले देश के प्रति उनकी नागरिक वफादारी को भी मजबूत करे।
- डिजिटल संप्रभुता और साझा वैश्विक नियम: सीमाओं से परे राष्ट्रवाद अक्सर डिजिटल माध्यमों से संचालित होता है। चरमपंथ, टूलकिट और दुष्प्रचार जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर कानूनों और डेटा संप्रभुता के लिए वैश्विक आम सहमति बनाने का नेतृत्व करना चाहिए।
निष्कर्ष
21वीं सदी में राष्ट्रवाद का अंत नहीं हो रहा है, बल्कि इसका क्षितिज व्यापक हो रहा है। वफादारी अब एक ‘शून्य-योग खेल’ (Zero-Sum Game) नहीं है, जहां एक व्यवस्था के प्रति निष्ठा का अर्थ दूसरी व्यवस्था से द्रोह हो। मोहन भागवत का यह बयान आरएसएस के वैचारिक विकास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। वर्तमान समय की मांग “प्रबुद्ध राष्ट्रवाद” (Enlightened Nationalism) की है—जो अपनी राष्ट्रीय सीमाओं और हितों की रक्षा भी करे, और वैश्विक मानवता व आधुनिक नागरिकता के सिद्धांतों का सम्मान करने से भी पीछे न हटे।
