आधार-मतदाता सूची एकीकरण: चुनावी शुचिता का डिजिटल रोडमैप (Aadhaar-Voter List Integration: A Digital Roadmap for Electoral Integrity)

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों केशुद्धिकरण के लिए चलाए जा रहेपारंपरिक ‘विशेष गहन समीक्षा’ कार्यक्रम में भारी प्रशासनिक लागत, जनशक्ति और समय लग रहा है। इस प्रक्रिया को आधुनिक, पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए कल्याणकारी योजनाओं की तर्जपर आधार के बुनियादी ढांचे और ‘फेस-ऑथेंटिकेशन’ तकनीक का उपयोग करनेका नीतिगत प्रस्ताव सामने आया है। सरकार द्वारा ‘चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021’ के माध्यम से इस एकीकरण को कानूनी आधार दिए जानेके बाद से यह विषय तकनीकी, कानूनी और नागरिक अधिकारों के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है।

भारी वित्तीय और प्रशासनिक लागत: मतदाता सूची संशोधन के प्रत्येक चक्र मेंलगभग 10 लाख लोक सेवकों (मुख्यतः सरकारी स्कूल के शिक्षकों) को लगाया जाता है। इससेदेश के खजानेसेकरोड़ों रुपये खर्चहोतेहैं और बुनियादी प्रशासनिक व शैक्षणिक कार्य बुरी तरह प्रभावित होतेहैं।

नागरिकों पर अतिरिक्त बोझ: गरीब, प्रवासी और महिलाओं को अपनी पात्रता साबित करनेके लिए कठिन कागजी दस्तावेज़ जुटानेपड़तेहैं। इस जटिल प्रक्रिया के कारण कई बार समाज के वंचित वर्गके वैध नागरिक भी मतदाता सूची सेबाहर हो जाते हैं।

परंपरागत दस्तावेजों की अपर्याप्तता: पासपोर्ट(जो केवल ~8% भारतीयों के पास है), पैन या राशन कार्डजैसे दस्तावेज नागरिकता, पतेया आयुका अचूक और सार्वभौमिक प्रमाण नहीं बन पाते और न ही येदोहरेपंजीकरण को पूरी तरह रोक सकतेहैं।

नागरिक उत्पीड़न और निष्कासन का डर: विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों सेनाम हटाए जानेके मामलों ने बड़े पैमानेपर कानूनी और सामाजिक चिंताओं को जन्म दिया है। अतीत मेंकुछ पायलट प्रोजेक्ट्स मेंभी तकनीकी त्रुटियों के कारण लाखों योग्य मतदाताओं के नाम अनजानेमेंकट गए थे।

वित्तीय बचत का सफल मॉडल: आधार के माध्यम सेपैन को डी-डुप्लिकेट करने, बेनामी खातों को बंद करने और कल्याणकारी योजनाओं सेफर्जी लाभार्थियों को हटानेसेसरकार को 2.7 लाख करोड़ रुपयेसे अधिक की बचत हुई है। यही मॉडल चुनावी शुचिता में भी पारदर्शिता ला सकता है।

भूतिया और दोहरे मतदाताओं का खात्मा: देश मेंकई नागरिक नौकरियों या अन्य कारणों से एक से अधिक स्थानों की मतदाता सूची में पंजीकृत होते हैं। चूंकि आधार बायोमेट्रिक रूप से अद्वितीय है, इसलिए यह ‘भूतिया मतदाताओं’ (Ghost Voters) और दोहरेपंजीकरण को पूरी तरह समाप्त कर ‘एक राष्ट्र, एक मतदाता सूची’ की परिकल्पना को साकार कर सकता है।

तकनीकी स्थिरता के ठोस उदाहरण:

o डिजियात्रा: 100 से अधिक हवाई अड्डों पर चेहरे की पहचान (Face Authentication) के जरिए 10 करोड़ से अधिक सफल ट्रांजैक्शन हो चुके हैं।

o जीवन प्रमाण: 1.47 करोड़ पेंशनभोगियों ने घर बैठेकेवल अपनेफोन कैमरे और चेहरेकेसत्यापन से अपना जीवन प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया है।

o व्यापक स्वीकार्यता: अब तक 5500 करोड़ से अधिक आधार प्रमाणीकरण सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं, जो इस तकनीक की विश्वसनीयता को दर्शाता है।

बायोमेट्रिक डेटा की परिपक्वता और प्रवासी मतदाता: आधार डेटाबेस का एक बड़ा हिस्सा अब परिपक्व हो चुका है और मतदाता बननेकी कानूनी आयु(18 वर्ष) को पूरा करता है। साथ ही, यह भविष्य में रिमोट वोटिंग या डिजिटल वोटिंग को सक्षम करनेके लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करेगा।

गोपनीयता और डेटा सुरक्षा: मतदाता सूची एक सार्वजनिक दस्तावेज है, जबकि आधार डेटा अत्यंत गोपनीय माना जाता है। दोनों को जोड़ने से’ प्रोफाइलिंग’ और मतदाता व्यवहार को ट्रैक करने का जोखिम बढ़ जाता है, जो सुप्रीम कोर्ट के पुट्टस्वामी निर्णय (Right to Privacy) का उल्लंघन हो सकता है।

डेटा आइसोलेशन (Data Silos): मतदाता प्रोफाइलिंग को रोकने के लिए चुनाव आयोग और आधार डेटाबेस के बीच डेटा का एक सुरक्षित पृथक्करण होना चाहिए ताकि राजनीतिक दल इस डेटाबेस का दुरुपयोग लोक-लुभावन योजनाओं को लक्षित करने या विशिष्ट समुदायों को डराने के लिए न कर सकें।

स्वैच्छिक बनाम अनिवार्यकी अस्पष्टता: सरकार का दावा है कि यह लिंकिंग ‘स्वैच्छिक’ है, लेकिन व्यावहारिक रूप से फॉर्म में आधार न देने के लिए “पर्याप्त कारण” बताना होता है। जो लोग डिजिटल माध्यम का उपयोग नहीं करना चाहते, उनके लिए पारंपरिक ‘मैन्युअल रूट’ (कागजी सत्यापन) का विकल्प बिना किसी बाधा के खुला रहना चाहिए।

1. साझा तकनीकी ढांचा: निर्वाचन आयोग को एक सुरक्षित ‘Face-Authentication Application’ विकसित करना चाहिए, जो मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाए।

2. स्मार्टफोन आधारित स्वैच्छिक सत्यापन: नागरिकों को मोबाइल के माध्यम सेवन-स्टेप (One-step) सत्यापन की सुविधा दी जाए, जिससे उन्हें किसी सरकारी कार्यालय के चक्कर न काटने पड़ें और बहुमूल्य समय व संसाधनों की बचत हो सके।

3. मजबूत डेटा संरक्षण कानून का प्रवर्तन: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम के प्रावधानों को चुनावी डेटाबेस पर कड़ाई सेलागूकिया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के डेटा लीक या दुरुपयोग को रोका जा सके।

4. अपवाद प्रबंधन (Exception Handling): केवल तकनीकी खराबी या बायोमेट्रिक मिसमैच के आधार पर किसीका नाम सूची सेसीधेहटानेके बजाय, संदिग्ध मामलों को भौतिक सत्यापन के लिए संबंधित अधिकारियों के पास भेजा जाना चाहिए।

तकनीक लोकतंत्र को सशक्त बनाने का एक माध्यम है, साध्य नहीं। जब देश की व्यवस्था हवाई अड्डों पर नागरिकों की सुरक्षा की जांच के लिए और बुजुर्गों को पेंशन देनेके लिए फेस ऑथेंटिकेशन तकनीक पर भरोसा कर सकती है, तो देश केलोकतंत्र की बुनियाद—यानी मतदाता सूची—को सुरक्षित करनेके लिए इस तकनीक का उपयोग करनेसेपीछेनहीं हटना चाहिए। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, एक भी वैध मतदाता का छूटना पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ेकर सकता है। अतः ‘सटीकता’ और ‘समावेशिता’ के बीच एक मजबूत संतुलन स्थापित करना होगा। यही स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की दिशा में सही कदम होगा।

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